अर्स से फर्श तक आने की दो कहानियां

कल्याणसिंह राठौड़

आज आपके लिए दो कहानी पेश कर रहा हूं। एक कहानी है इंदौर के दो मीडिया हाउस की और एक कहानी है कांग्रेस की। दोनों में बहुत समानता है। पहली कहानी मीडिया हाउस की।
किसी समय इंदौर में नई दुनिया अखबार का एकछत्र राज हुआ करता था। यूं तो उस समय भी बहुतेरे अखबार निकलते थे, जिसमें नवभारत, इंदौर समाचार, स्वदेश, जागरण भी थे, परन्तु इन अखबारों की प्रसार संख्या ज्यादा नहीं थीं। फिर 1983 में इंदौर से दैनिक भास्कर का प्रकाशन शुरू हुआ। तब अपन स्वयं स्कूल जाने के साथ सुबह 4 बजे उठकर अखबार भी बांटते थे, यानि हॉकर का काम करते थे। उस समय इंदौर ज्यादा फैला हुआ शहर नहीं था, इसलिए अखबार के सिर्फ दो ही ठिये हुआ करते थे। एक था श्रीकृष्ण टॉकीज जो टूट चुका है उसके पीछे वाली गली में भार्गवजी के यहां नईदुनिया उतरता था। दूसरा ठिया था खजूरी बाजार में दुलीचंदजी जैन का, जहां से भास्कर मिलता था। यहीं से सारे हॉकर अखबार उठाते थे और घरों में डालने के लिए निकल जाते थे। तब अधिकतर हॉकरों के पास नई दुनिया की प्रतियां ही हुआ करती थीं। भास्कर की बहुत कम प्रतियां होती थीं। धीरे-धीरे भास्कर ने अपनी प्रसार संख्या बढ़ाना शुरू की। भास्कर नित नए प्रयोग करने लगा। दैनिक भास्कर ने यूथ पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया और समय के साथ अखबार में कई परिवर्तन किए। पाठकों को मानना है कि बुद्धिजीवियों के अखबार के रूप में लोकप्रिय नई दुनिया ने वक्त के साथ समुचित बदलाव नहीं किए, वह अपने पुराने पैटर्न पर ही चलता रहा, उसने वक्त रहते दूसरों अखबारों की तरह हर वर्ग के पाठकों के अनुकूल बनने में रुचि नहीं दिखाई। कहा तो यह भी जाने लगा कि नई दुनिया तो मात्र बुजुर्गों और व्यापारियों का अखबार है। प्रबुद्ध वर्ग मानता है कि वक्त के साथ बदलाव में पिछड़ने की वजह से ही नईदुनिया से प्रसार संख्या में दैनिक भास्कर आगे निकल गया। नई दुनिया ने वक्त चूक जाने के बाद बदलाव किए लेकिन तब तक वह रेस में काफी पिछड़ गया था।
अब बात करें देश की सबसे सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की। एक समय था जब देश में सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस पार्टी का ही वर्चस्व था। कांग्रेस के सामने कम्युनिस्ट, जनसंघ, जनता पार्टी और बाद में भारतीय जनता पार्टी की कोई बिसात नहीं थी। यहां तक कि देश के कुछ प्रदेशों में तो जनसंघ के झंडे-डंडे उठाने और दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता तक नहीं थे। कांग्रेस के गठन के बाद पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू, फिर इंदिरा गांधी उनके बाद राजीव गांधी। राजीव गांधी के असमय काल कवलित होने पर कुछ समय के लिए सीताराम केसरी जरूर कांग्रेस अध्यक्ष बनें, परन्तु उन्हें किस कदर बेइज्जत कर पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया गया था, यह किसी से छुपा नहीं है। फिर सोनिया गांधी 19 साल तक कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष रहीं। उनके कार्यकाल में कांग्रेस ने दो बार देश में डॉ. मनमोहनसिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई और चलाई भी। सोनिया के बाद कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को सौंप दी गई। राहुल वह करिश्मा नहीं दिखा पाए जो सोनिया ने दिखाया था। उनकी छवि और राजनीतिक समझ पर भी उनकी पार्टी के अंदर दबे-छुपे और अन्य दलों के द्वारा खुलेआम सवाल उठाए जाते रहे।
इस बीच, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र की राजनीति में आए और उन्होंने कांग्रेस को कांग्रेस की ही भाषा में जवाब देना शुरू किया और आज कांग्रेस अर्स से फर्श पर पहुंच गई है। कारण सिर्फ इतना है कि कांग्रेस एक परिवार की बपौती बन चुकी है और संभवत: उस परिवार से वह बाहर नहीं आना चाहती। 2019 का चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। पहले तो उनकी ही काफी मान-मनोव्वल चलती रही, परन्तु वे नहीं माने और उन्होंने इस्तीफा वापस नहीं लिया। पूरे ढाई माह तक यह ड्रामा चला और अंतत: हुआ यह कि सोनिया ने जो पद अपने बेटे को सौंपा था, वही पद अब बेटे ने अपनी मां को सौंप दिया। कहने को सोनिया अंतरिम अध्यक्ष हैं और नए अध्यक्ष का चुनाव होना बाकी है। जब ढाई महीने में अध्यक्ष नहीं ढूंढ सके तो कोई जरूरी नहीं कि आने वाले समय में यह पद गांधी परिवार से बाहर किसी अन्य को सौंप दिया जाए।
कहने को कुछ लोगों ने प्रियंका गांधी के लिए भी खूब जोर लगाया कि वे कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं, परन्तु यह तीर भी निशाने पर नहीं लगा, इस तीर का हश्र यूपी में देख चुके हैं। जहां कांग्रेस को रायबरेली सीट पर सोनिया गांधी ने जीत दिलाई। यहां तक कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अमेठी से हार गए।  रोज समाचारों से ज्ञात होता है कि कोई न कोई नेता कांग्रेस छोड़कर भाजपा या अन्य किसी पार्टी में चला जाता है। यहां तक कि वर्षों तक उनके परिवार के जो वफादार रहे हैं, वे भी पार्टी छोड़ रहे हैं। क्या सोनिया इस भाग-दौड़ को रोक पाएंगी। क्या वे पार्टी में फिर से जान फूंक सकेंगी या फिर कांग्रेस मरणासन्न स्थिति में पहुंच जाएगी, यह वक्त ही बताएगा।

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